मना लो जस्न मेरी बर्बादी

माना लो जस्न मेरी बर्बादी की दुनिया वालों......
सुना है वो अभी बहुत सुकून पातें हैं ............

जिन्हें हम पा न सके हकिकत में सही ........
उन्हें अब ख्वाब में भी पाने से डर लगता है......

माना लो जस्न ...............

बढ़ी हैं दूरियां आज इतनी अपने दर्मिया.......
किसे यकीं हैं, कभी साथ भी चलें................

अब तो ये आलम है की , हर हिचकी पे डर लगता है...........
उनकी बातों में कहीं अपना जिक्र सा लगता है.....

माना लो जस्न ...................

मेरी वफाओं का खुदा, इतना सा सफ़क देना .....
मेरे जनाजे की राह में उनका घर देना .............

माना लो जस्न मेरी बर्बादी की दुनिया वालों ....
सुना है वो भी बहुत सुकून पातें हैं ................

Comments

  1. आपका ब्लॉग बहुत ही अच्छा लगा|
    आपकी दर्द भरी कवितायेँ दिल को छू लेती हैं|
    बहुत ही अच्छा लिखा आपने...

    "कुछ यूहीं" पर कुछ और नया के इन्तेज़ार में...

    आपका,
    आशीष अंकुर

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