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तू  कहती है, दीपक ,तेरे  लिए तुझसे बात नहीं करती, मैं कैसे कहूँ , हर  आहट पे दिल तुझे  ढूंढ़ता है तू कहती है, मेरी हर छोटी बात क्यूँ याद रखते हो , मैं कैसे कहूँ, तेरे सिवा कुछ याद नहीं रहता है तू कहती है , तुझे रात को नींद क्यूँ नहीं आती , मैं कैसे कहूँ , पलके दीवारों पे तेरी सकल ढूँढती है तू कहती है , तुम मुझे भूल क्यूँ नहीं जाते मैं कैसे कहूँ ,  तुझे किताबों के जवाबों सा नहीं पढ़ा है तू कहती है , दीपक मेरे बैगैर तू कैसे जीता है , मैं कैसे कहूँ , दिन गुजरता है ज़िन्दगी अब भी वही पर है
मैं ये सोचूं की तू बेवफा हो जाये कुछ और जी लूँ ,अगर ऐसा हो जाये ,  ग़ज़ल के शेर अब नहीं पकते अबकी जो तू रूठे , एक खंजर हो जाये होगा कोई दिन मेरा भी दुआ कबूल कोई तेरा हो और तुझसा हो जाये , मैं खुद को पत्थर कर लूँ मगर जब दिल रोये तो लहू हो जाए , बेवजह नहीं है सांसो का थमना मुझे देखे और वो संवर जाये ,
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सिने में है दर्द , बताओ तो क्या लिखूं शराब पियू ,या चाय पि के बहकू , बताओ तो क्या लिखूं उन शायरों जैसा सोचूं ,ढल जाऊं रांझे सा रूप या ऑफिस का ड्रेस कोड ,बताओ तो क्या लिखूं तेरी यादों में सोचु ,डूबता रहूँ तेरी बातें या "sql" and ".net ",बताओ तो क्या लिखूं घर को कर दूं बर्बाद रोड पे घुमू या दोस्तों का 3-BHK स्कीम ,बताओ तो क्या लिखूं
बात करो तो बेरुखी से करो नफरत सही पर दिल से करो , तेरे महफ़िल में मेरा नाम क़त्ल सही , पर इल्जाम तो धरो , बहुत हो गया सजदे करते करते वाली सही पर काफ़िर तो करो , रिश्तों में जो हो गई दूरियां चुप सही पर हलचल तो करो , गरीबों के बर्तन खाली खनकते है राख सही पर धुंआ तो करो
जो हो न सका उसका मलाल क्यूँ करें फिजूल अपना दिमाग खराब क्यूँ करें , न किया वफ़ा तो न किया रात में अपनी नींदे खराब क्यूँ करें , चल दिल घूम के आते हैं गली किसी और का एक जगह रह कर अपनी इज्जत खराब क्यूँ करें आँखे -वांखे , शायरी -ग़ज़ल ,नाजुक-वाजुक ,कलाई-वलाई बेकार है सब ,ला खिला भर पेट ,खुद को बर्बाद क्यूँ करें
कभी यूँ हो की हंस के मिले जब भी मिले वो  खफा मिले , ख्वाबो में मिले तो ऐसे मिले मुझे फिर कभी सहर न मिले, वो  आये कुछ इस तरह दर पे मेरे घर में कोई आहट न मिले , या खुदा दिल को अमीरी कर दे मिले कोई भी मुझसे भूका न मिले
मुझसे मेरा खबर पूछते हैं लोग मुझे अब किधर पूछते हैं , थी लबो पे हंसी मेले थे घर में उदास खंडहरों को लोग किधर पूछते हैं कौन सी सूरत है जिसमे लोग से लोग मिले हम जब भी मिले लोग मतलब पूछते हैं , डुबों के तूफा में कशती हमारी लोग हमसे हमारा हुनर पूछते हैं
कोई हमनाम कोई हमराह मिले उनसे भी तो कोई रह मिले , परदेश में न आती याद कबो कबो तो दुनिया से बेपरवाह मिले, अधूरे ख़त अधूरे कार्ड मिले उसे याद करने की वजह मिले , दिल मिले न मिले , हाथ मिले वो मुझे कुछ इस तरह मिले , छोड़ आये थे जो यादें मुझे मेरे घर में हर जगह मिले , कभी आहट , कभी खुशबु कभी झोके की तरह मैं जब भी मिला तबाह मिला